Brahma Kumari-ब्रह्माकुमारी संस्था का असली सच क्या है।

Brahma Kumari-ब्रह्माकुमारी संस्था का असली सच क्या है।

 

प्रारंभिक इतिहास 

Brahma Kumari-Diamond hall

Brahma Kumari विश्वविद्यालय की स्थापना 1936 मैं हुई थी इस संस्था के संस्थापक लेखराज कृपलानी था इस संस्था को ब्रह्माकुमारी ब्रह्मा की बेटियां इस संस्था को संभालती है इस महिलाओं की प्रमुख भूमिका माना जाता है 

 

1947 में भारत के विभाजन के बाद इस संस्था ने अप्रैल 1950 को राजस्थान के माउंट आबू जिले मैं चले गए इसके बाद में इसका नाम बदलकर ब्रम्हाकुमारी विश्वविद्यालय रख दिया गया 

 

उसके बाद 18 जनवरी 1969 को दादाजी लेखराज की मृत्यु हो गई थी ब्रम्हाकुमारी यों का बाद में अन्य देशों में प्रचार हुआ था इसकी शुरुआत विदेशों में सबसे पहले लंदन में हुई थी और इसके बाद में पश्चिम देशों में किसका प्रचार प्रचार किया गया इस  संस्था के पूरे दुनिया में 8800 से अधिक सेंटर है 

 

दादा लेखराज का जीवन परिचय 

दादा लेखराज

लेखराज कृपलानी का अन्य नाम-प्रजापिता ब्रह्मा,ब्रह्मा बाबा

इनका जन्म 15 दिसंबर1876 में पाकिस्तान की कराची शहर मैं हुआ था।

निधन-18 जनवरी 1969 में हुआ था।

उम्र-92 साल थी। 

धर्म-हिंदू

देश-भारत 

माना जाता है उनके शरीर में अध्यात्मिक शिव प्रवेश करते थे।

1937 में किस संस्था को ओम मंडली के नाम से जाना जाता था। 

 

महिलाओं की भूमिका आध्यात्मिक नेताओं के रूप में

लेखराज कृपलानी

ब्रम्हाकुमारी विश्वविद्यालय की महिलाओं का नेतृत्व दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संगठन है।

इसके संस्थापक प्रजापिता ब्रह्मा बाबा थे।

 

80 वर्षों से अधिक उनके नेतृत्व को स्थिर साहस,और एकता के लिए गहरी प्रतिबद्धता की विशेषता है। 

ब्रह्माकुमारियों ने दुनिया के आध्यात्मिक संगठनों के मंच पर अलग खड़ा किया।

ब्रह्म कुमारियों ने सभी महाद्वीपों पर 140 से अधिक देशों में फैलाया है।

 

अब वो महत्वपूर्ण समय आया है जब परमात्मा पुनः पवित्रता,प्रेमशांति, व सुख की दुनिया स्थापित करने के लिए इस धरती पर आए हुए हैं। परमात्मा कहते हैं – ” अपने को आत्मा समझ मामेकम याद करो तो तुम्हारी आत्मा पवित्र बन जाएगी। 

 

इस जन्म में जो सम्पूर्ण पवित्र बनेंगे वही मुझ द्वारा स्थापित नई दुनिया – सतयुग में आएंगे और बहुत सुख प्राप्त करेंगे यह परमात्मा के महावाक्य हैं।  तो अब हमें निर्णय लेना है कि हमें श्रीमत पर चल अपना भाग्य स्वयं निर्मित करना है।  

 

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